”स्त्रियां तू सर्वं तद् रोचते कुलम ”
नव शक्ति, अष्ट लक्ष्मी नारी तूं नारायणी , नारी विद्दा , नारी सौभाग्य, नारी अमृत, नारी काम , नारी सत्य, नारी भोग,नारी योग। सभी रूपों स्वरूपों में नज़र आने वाली हे नारी! तूं मात्र देह नहीं जीवन का नज़रिया है। जिस कुल में नारी प्रसन्न रहती है वह कुल संपन्न रहता हे ऐसा तो हमारे वेदों में भी कहा गया है। जिसके बिना सृष्टि की संरचना ही नहीं सोची जा सकती उसी नारी की आज यह दुर्दशा है कि चहुँ ऒर सुह्योधन दुर और सुहसाशन दुः बना दीख पड़ता है। यह आज के काल की विडम्बना ही है की हर और दुर्योधनों और दुःशाशनो की बारात खड़ी नज़र आती है।
आदि काल से ही हमारी संस्कृति में नारी को पूजनीय माना गया है नारी को देवी की उपाधि दी गयी है। उसकी तुलना ब्रह्मशक्ति ,
वैष्णवी ,दुर्गा और शक्ति जैसी सबला के रूपों से की गयी है। नारी के अनेक रूप हैं,वह एक माँ एक बहन एक प्रेयसि, एक पत्नी, एक पुत्री है जिसके कारण ही सृष्टि चलायमान है।नारी वह गंगा है जो घर ,समाज , देश ही क्या उसने तो देवराज इंद्र के पाप तक खुद में समन्वित किया है।
हमारा आज फिर उस युग में पहुँच गया है जहां हमें अपनी लड़ाई स्वयं के बलबूते पे ही लड़नी पड़ेगी। माँ लक्ष्मी के स्वरुप से निकल कर महिषासुर मर्दिनी बनना पड़ेगा। मात्र शिकायतों और रोना रोने के बजाय एक दुसरे का सहारा और हिम्मत बनकर अत्याचारों का अंत करना पड़ेगा। इसका अर्थ यह कत्तई नहीं की शाश्त्र और कानून को हाथ में लें बल्कि इसका अर्थ है की हम हमारी ज़रूरतमंद बहनों को उनको मिल रही या मिल सकने वाले अवसरों से अवगत कराएं और उन्हें उनसे शिक्षित कराएं। “निवेदिता”
नारी तूं नारायणी
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5 responses to “नारी तूं नारायणी”
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इसको reblog कीजिए। बेहद सुंदर तरीक़े से प्रेरणा दी है आपने, इसे विस्तृत मंच मिलना चाहिए।
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जी ज़रूर आदेश शिरोधार्य
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Beautiful. ..N totally true
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Thank you 🙂
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My best is when I express myself like I did in this one and Nivedan , nivedita .. I think when we express myself in words I write better 🙂
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