विचार/ Thoughts

कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती है
हम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें  रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।
दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,
खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।
कभी कभी प्रतीत होता है कि इन ख़ोखल दीवारों में दबी
यादें भी सिसकियां भरती होंगी और सोचती होंगे ये क्या थे क्या हो गये। जानिये क्या सोचतीं होंगी वो दीवारें खिड़कियां और किवाड़ें जो गवाह हैं गए कल से आने वाले कल तक के..

वो चहक वो चमक कहां खो गईं कहां वो हंसी गुम हुई
क्यों उदासीन है यह कमरा क्यों खामोश वो हो गई
जो थकती न थी कहते चहकते क्यों वो आज चुप हो गई
अब आप चाहें तब तक चुपचाप सुनें उसकी चुप्पी गूंजती है
दिखावे को वो दिन भर मुस्कुराती रातों को सिसकती है। ज्योत्सना “निवेदिता”

Comments

3 responses to “विचार/ Thoughts”

  1. Gerry Palermo Avatar

    smiles throughout the day and sobs at night…

    1. bhaatdal Avatar

      Fighting with all the odds in the day
      But loosing to the evens of Night ..

  2. bhaatdal Avatar

    Hahaha.. Google is funny at times
    The crux is ..
    Fighting with all the odds in the day
    But loosing to the evens of Night ..

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