कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती है
हम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।
दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,
खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।
कभी कभी प्रतीत होता है कि इन ख़ोखल दीवारों में दबी
यादें भी सिसकियां भरती होंगी और सोचती होंगे ये क्या थे क्या हो गये। जानिये क्या सोचतीं होंगी वो दीवारें खिड़कियां और किवाड़ें जो गवाह हैं गए कल से आने वाले कल तक के..
वो चहक वो चमक कहां खो गईं कहां वो हंसी गुम हुई
क्यों उदासीन है यह कमरा क्यों खामोश वो हो गई
जो थकती न थी कहते चहकते क्यों वो आज चुप हो गई
अब आप चाहें तब तक चुपचाप सुनें उसकी चुप्पी गूंजती है
दिखावे को वो दिन भर मुस्कुराती रातों को सिसकती है। ज्योत्सना “निवेदिता”
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