Category: हिंदी, कविता
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शरद पूर्णिमा
आई फिर पूस की रातछंटता आज तड़ित अंधकारउज्वल उदित पूर्ण चंद्रमांआज शरद रात्रि की पूर्णिमाकुमुद खिले हैं खिली चांदनीअमृत बनकर बरसी कौमुदीपीलो ये अमृत का प्यालाबनकर गोपिका संग गोपालाबांसुरी जब कृष्ण बजाएंअधरों पे जो तान सजाएंसज संवर कर आई राधिकानिधि वन में सब रास रचाएंज्योत्सना ” निवेदिता “
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राजनीति के रंग
राजनीति का खेल निरालानेताओं का चक्कर झाला अजब गजब है नियम पकड़ेखुद ही बनायें और बिगाड़े सब में एक चौकीदार निराला सबको भगवा में रंग डालाबाइडेन कहे तू मेरा प्यारापुतिन कहे है दोस्त हमारा पप्पू के तो कहने ही क्या राजनीति को समझ न पायाविपक्ष का खेमा ही डुबाया किसी सवाल का जवाब न पाया…
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मन
मन बंजारा डोल रहा हैप्रेम शहद मद घोल रहा हैमीठी मीठी बातों से वोज़हर में मिश्री घोल रहा है ना जाने क्यों रूष्ट हुआ हैमुझसे मुंह अब मोड़ लिया हैजाने अंजाने जो भी था वोमन ने सब कुछ छोड़ दिया है मन ही मन की बातें जानेसुनना जाने सुनाना जानेमीठे कड़वे भेद ये जानेहंसाना जाने…
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विचार/ Thoughts
कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती हैहम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।कभी कभी…
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विचार
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अकेली
कैसे हैं आप?यह भी जानती हूं मेरे ऐसा कहने और करने की कोई आवश्यक्ता भी नहीं और न ही आपको कोई फर्क पड़ेगा फिर भी पूछना मेरी आदत बन गई है और मजबूरी भी। न जवाब का इंतजार न उम्मीद, बस पूछ लेना मेरी विवशता है क्यूंकि जानती हूं जैसे भी होंगे ठीक ही होंगे…
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तांत
रेशम के धागों में बुने हुएकिसी तांत की साड़ी मेंसमय की परतों मेंसिमटी हुई “वो”साड़ी की सिलवटों मेंगुलाब की पंखुड़ियों की तरहबचपन से जवानी तकउसका एक कली से फूल बननायौवन की अल्हड़ अठखेलियांप्रेम में हंसना खिलखिलानाऔर फिर प्रौढावस्था तकफूल के खिलने से बिखरने तककजरारी आंखों से ख्वाब झांकते रहेउसके आंचल में पलते रहेतब तक के…
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बादल
ये बादल मुझे क्यूं लुभाते हैंबार बार अपनी ओर बुलाते हैंऔर मैं खिंचती चली जाती हूंचांद को छुपाकर सीने मेंमुझसे बहुत दूर ले जाते हैंकभी भागती हूं इनके पीछेकभी थककर बैठ जाती हूं जानती हूं के वो भी इन्हेंमेरी ही तरह दूर से ताकते होंगेइनमे बनती बिगड़ती आकृति मेंकभी मुझे कभी मेरे चेहरे को ढूंढते होंगेक्या…
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धरती और अम्बर
मैं धरती वो अम्बरवो रहते हैं शीर्ष गगन परमेरी नज़रें भी जहां नहीं पहुँचेउनका मुक़ाम है इतना ऊपर बस छूने की चाहत लिए मन मेंमेघ सुस्ता रहे हैं उत्ताल शिखर मेंएक आलिंगन हो धरा अम्बर काहो मिलन हरितिमा और गगन का नभ सींचे धारा को प्रेम की बूंदों सेहो संगम अप्रतिम किरणों सेबुझे प्यास मरू…
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उषा
मेरी यह कविता नॉर्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों में भोर के समय का वर्णन है। चूंकि वहां सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो जन जीवन भी उतनी ही जल्दी शुरू हो जाता है किस प्रकार एक ओर प्रकृति अपने सौंदर्य से ओतप्रोत होती है तो दूजा देवालयों में हो रही आरती अर्चना की आवाज गूंज…