Category: हिंदी, Hindi, kavita, poem, कविता

  • सुविचार

    सरल रहें, तरल रहेंकर्म करें, सफल रहें शांत रहें, मधुर कहेंतटस्थ रहें, सत्य कहें विवेक धरें, प्रेम करेंपुण्य करें, धर्म करें हंसते रहें, स्वस्थ रहेंखुशियां बांटे मस्त रहें ज्योत्स्ना शर्मा “निवेदिता”

  • जीवन गणित

    जीवन का गणित बहुत आसान है एक और एक दो नहीं ग्यारह होते हैं गुणा भाग नहीं सिर्फ जोड़ बाकी होता है खुशियों को जोड़ते हैं दुख घटाए जाते हैं किस्मत गुणा होती है कर्म भाग किया जाता है जीवन का बस यही फलसफा होता है ज्योत्स्ना “निवेदिता”

  • शरद पूर्णिमा

    आई फिर पूस की रातछंटता आज तड़ित अंधकारउज्वल उदित पूर्ण चंद्रमांआज शरद रात्रि की पूर्णिमाकुमुद खिले हैं खिली चांदनीअमृत बनकर बरसी कौमुदीपीलो ये अमृत का प्यालाबनकर गोपिका संग गोपालाबांसुरी जब कृष्ण बजाएंअधरों पे जो तान सजाएंसज संवर कर आई राधिकानिधि वन में सब रास रचाएंज्योत्सना ” निवेदिता “

  • राजनीति के रंग

    राजनीति का खेल निरालानेताओं का चक्कर झाला अजब गजब है नियम पकड़ेखुद ही बनायें और बिगाड़े सब में एक चौकीदार निराला सबको भगवा में रंग डालाबाइडेन कहे तू मेरा प्यारापुतिन कहे है दोस्त हमारा पप्पू के तो कहने ही क्या राजनीति को समझ न पायाविपक्ष का खेमा ही डुबाया किसी सवाल का जवाब न पाया…

  • विचार/ Thoughts

    कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती हैहम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें  रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।कभी कभी…

  • विचार

  • अकेली

    कैसे हैं आप?यह भी जानती हूं मेरे ऐसा कहने और करने की कोई आवश्यक्ता भी नहीं और न ही आपको कोई फर्क पड़ेगा  फिर भी पूछना मेरी आदत बन गई है और मजबूरी भी। न जवाब का इंतजार न उम्मीद, बस पूछ लेना मेरी विवशता है क्यूंकि जानती हूं जैसे भी होंगे ठीक ही होंगे…

  • पत्थर दिल

    कुछ लोग पत्थर के बने होते हैंन जीवन से समझते हैं न मृत्यु सेबर्फ से ठंडे दिल और गर्म सलाखों सा दिमागन प्रेम से पिघलते हैं न प्यार से समझते हैंकुछ लोग पत्थर के बने होते है कुछ बातें या तो उनकी समझ के परे होते हैंया समझकर भी ढोंग नासमझी का करते हैंकठोर हृदय…

  • तांत

    रेशम के धागों में बुने हुएकिसी तांत की साड़ी मेंसमय की परतों मेंसिमटी हुई “वो”साड़ी की  सिलवटों  मेंगुलाब की पंखुड़ियों की तरहबचपन से जवानी तकउसका एक कली से फूल बननायौवन की अल्हड़ अठखेलियांप्रेम में हंसना खिलखिलानाऔर फिर प्रौढावस्था  तकफूल के खिलने से बिखरने तककजरारी आंखों से ख्वाब झांकते रहेउसके आंचल में पलते रहेतब तक के…

  • बादल

    ये बादल मुझे क्यूं लुभाते हैंबार बार अपनी ओर बुलाते हैंऔर मैं खिंचती चली जाती हूंचांद को छुपाकर सीने मेंमुझसे बहुत दूर ले जाते हैंकभी भागती हूं इनके पीछेकभी थककर बैठ जाती हूं जानती हूं के वो भी इन्हेंमेरी ही तरह दूर से ताकते होंगेइनमे बनती बिगड़ती आकृति मेंकभी मुझे कभी मेरे चेहरे को ढूंढते होंगेक्या…