आई फिर पूस की रात
छंटता आज तड़ित अंधकार
उज्वल उदित पूर्ण चंद्रमां
आज शरद रात्रि की पूर्णिमा
कुमुद खिले हैं खिली चांदनी
अमृत बनकर बरसी कौमुदी
पीलो ये अमृत का प्याला
बनकर गोपिका संग गोपाला
बांसुरी जब कृष्ण बजाएं
अधरों पे जो तान सजाएं
सज संवर कर आई राधिका
निधि वन में सब रास रचाएं
ज्योत्सना ” निवेदिता “

Leave a Reply to Gerry Palermo Cancel reply